शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

छोटे राज्य की जिद


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देश में जहां-जहां पृथक राज्य बने, वहां-वहां यही नारा दिया गया था कि अलग राज्य बन जाने से उन क्षेत्रों का तेज विकास होगा। लेकिन हुआ इसका उलटा। झारखंड का उदाहरण लें, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा से संतृप्त इस छोटे से जनजातीय राज्य में भ्रष्टाचार हिमालय की ऊंचाई को पार कर गया है। यहां के वनवासियों को आज तक विकास के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, संचार सेवा, परिवहन सेवा तो दूर, दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है। पीने का पानी नहीं है। जंगलों में विकास के नाम पर एक ईंट नहीं लगी है। जबकि यहां के पूर्व मुख्यमंत्री, एक के बाद एक, सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपयों के घोटालों में पकड़े गए हैं।

पृथक तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के कारण आंध्र प्रदेश की सरकार ठप पड़ी है। उद्योग व्यापार का भी खासा नुकसान हो रहा है। हैदराबादवासियों का कहना है कि तेजी से आगे बढ़ता उनका राज्य दस वर्ष पीछे चला गया है। दूसरी तरफ पृथक राज्य की मांग करने वाले इतने भावावेश में हैं कि कुछ सुनने को तैयार नहीं। हर वर्ग के लोग इस आंदोलन में शामिल होते जा रहे हैं। नित नए धरने और प्रदर्शन जारी हैं। इन लोगों को बता दिया गया है कि पृथक तेलंगाना राज्य बनने से इनका क्षेत्र तेजी से विकसित होगा, जबकि यह केवल मृगतृष्णा है।

हरियाणा जैसे एकाध उदाहरण देकर यह सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि छोटे राज्य में विकास संभव है। पर उसके दूसरे कारण रहे हैं। सचाई तो यह है कि अलग राज्य बनने का मतलब है आम जनता की जेब पर डाका डालना। अलग राज्य बनेगा, तो अलग विधानसभा बनेगी, अलग हाई कोर्ट बनेगा, अलग सचिवालय बनेगा, अलग मंत्रिमंडल बनेगा और तमाम आला अफसरों की अलग फौज खड़ी की जाएगी। इन सब फिजूलखर्ची का बोझ पड़ेगा आम जनता की जेब पर, जिसे झूठे आश्वासनों, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

मुझे याद है गोरखालैंड का वह आंदोलन, जब वहां 25 वर्ष पहले पृथक राज्य बनाने की मांग चली थी। हर ओर गोरखाओं का आतंक था। आए दिन दार्र्जिलिंग में बंद हो रहे थे। बंद की अवहेलना करने वाले पर्यटकों की कारों पर पहाड़ों से पत्थर लुढ़काकर हमले किए जा रहे थे। ऐसे में आंदोलन के नेता सुभाष घीसिंग से मिलना आसान न था। बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगाकर मैं घीसिंग तक पहुंचा। मेरे चारों ओर एलएमजी का घेरा साथ चला कि कहीं मैं उनकी हत्या न कर दूं। इस आतंक के वातावरण में मैंने घीसिंग से पूछा कि उनकी इस मांग का तार्किकआधार क्या है? उत्तर मिला, ‘तुम मैदान वाला लोग हमारा शोषण करते हो। हमको अपने घरों में चौकीदार और कुक बना देते हो। हमारे राज्य की संपत्ति लूटकर ले जाते हो। हमको तुम्हारे अधीन नहीं रहना। हम अलग राज्य बनाएगा और गोरखा लोगों का डेवलपमेंट करेगा।अलग राज्य तो नहीं बना, पर गोरखा हिल डेवलपमेंट काउंसिलबन गई। बाद में उसी इलाके में काउंसिल केनेताओं के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चले। कुल मिलाकर गोरखा वहीं के वहीं रहे, नेताओं का खूब आर्थिक विकास हो गया।

किसी क्षेत्र का विकास न होने का कारण उस राज्य का बड़ा या छोटा होना नहीं होता। इसका कारण होता है, राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति का अभाव, सरकारी अफसरों का नाकारापन, जाति में बंटी जनता का वोट देते समय सही व्यक्तियों को न चुनना, मीडिया का प्रभावी तरीके से जागरूक न रहना, विपक्षी दलों का लूट में हिस्सा बांटना और सचेतक की भूमिका से जी चुराना। ऐसे ही तमाम कारण हैं, जो किसी क्षेत्र के विकास की संभावनाओं को धूमिल कर देते हैं। अगर हम सब अपनी-अपनी जगह जागरूक होकर खड़े हो जाएं, तो प्रशासन को काम करने पर मजबूर कर सकते हैं।

पर हमारी दशा भी उस राज्य की तरह है, जिसके राजा ने मुनादी करवाई कि आज रात को हर नागरिक राजधानी के मुख्य फव्वारे में एक लोटा दूध डाले, तो कल दूध का फव्वारा चलेगा। हर नागरिक ने सोचा, सभी तो दूध डालेंगे, मैं पानी ही डाल दूं तो क्या पता चलेगा? नतीजतन अगले दिन फव्वारे में पानी ही चल रहा था। जब कभी क्षेत्रीय स्तर पर पृथक राज्य की मांग को लेकर आंदोलन चलता है, जैसा आजकल तेलंगाना में हो रहा है, तो स्थानीय मीडिया आग में घी डालने का काम करता है। जबकि जरूरत इस बात की है कि उस क्षेत्र का मीडिया देश के बाकी राज्यों में जाए और वहां की जनता के अनुभव प्रसारित करे, ताकि स्थानीय जनता को पता चले कि ऐसी ही भावनाएं भड़काकर अन्य राज्यों का भी गठन हुआ था, पर उससे आम जनता को कुछ नहीं मिला।

आंदोलनकारी नेताओं को भी सोचना चाहिए कि अब समय तेजी से बदल रहा है। पहले वाला माहौल नहीं है कि एक बार सत्ता में आ गए, तो मनचाही लूट कर लो। अब तो खुफिया निगाहें हर स्तर पर सतर्क रहती हैं। किसी का भी, कभी भी, कहीं भी भांडाफोड़ हो सकता है। ऐसे में अब जनता को मूर्ख बनाकर बहुत दिनों तक लूटा नहीं जा सकता, क्योंकि जनता का आक्रोश अब उबलने लगा है। अगर पृथक राज्य की मांग करने वाले नेता वास्तव में जनता का भला चाहते हैं, तो इनको अपने मौजूदा प्रांत के विकास कार्यक्रमों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार और निकम्मेपन के खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए, जिससे इनके क्षेत्र की जनता को वास्तव में लाभ मिल सके।
लेखक....विनीत नारायण  
सौजन्य अमर उजाला 

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

अमर शहीद कैप्टन शशिकान्त शर्मा



 अभी कुछ दिन पहले हम सब लोग छोटे गॉधी के नाम से मशहूर अन्ना हज़ारे के साथ कदम से कदम मिलाकर और  उनकी ज़बान से निकला हर शब्द लोगो के लिए शब्दामृत होता था सारे लोग देश को भ्रष्टाचार मुक्त कराना चाहते थे और शायद अभी भी कराना चाहते है। लेकिन मै आप सभी भारतवासियों से पूंछना चाहता हूं कि जिन लोगो ने देश के मस्तक को ऊंचा करने के लिए अपने मस्तक को कटा दिया। आप लोग सोच रहे होगे कि हम किस शहीद की चर्चा कर रहे है,, जी हम बात कर    रहे है, शहीद कैप्टन शशिकान्त शर्मा।
     कैप्टन शशिकान्त शर्मा तो इस देश और देश के लोगो के लिए शहीद हो गए और देश की सरकार ने शहीद कैप्टन शशिकान्त शर्मा के लिए भी काम किया। उनके नाम का शिलापट्ट लगवाया गया। सड़को का निर्माण कराया गया। लेकिन सरकार को जो करना था सो रोते गाते कर दिया। लेकिन आप लोग जानते है कि इस देश के भद्र लोगो ने भी बहुत कुछ किया है। तो जाभी जाइए और तस्वीरो में देख भी लिजिए कि लोगो ने क्या किया।
लोगो ने शहीद कैप्टन शशिकान्त शर्मा के शहीद शब्द पर पान की पीच से रंग दिया है। शर्म आती है इस देश के लोगो को देखकर और तरस भी आता यहां कि सरकार पर। शहीद दिवस के दिन या 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन देश भक्ती गीत बचाने या टेन्ट लगाकर लोगो को कम्बल बांटने से कुछ नहीं होता और ना ही किसी के पीछे चिल्लाने से कुछ भला होने वाला। सच्चाई बस इतनी है कि जो लोग करने वाले होते है वो कर जाते है अकेले,, उन्हें न रह चाहिए और न ही किसी का साथ। शहीद कैप्टन शशिकान्त शर्मा की तिरस्कृत तस्वीर को आते जाते सब देखते है लेकिन लोगो से कहो तो लोग कहते है भाई हमारे पास समय का आकाल पड़ा है कुछ ज्यादा कहो तो कहते है कि बोलता है। तो आप लोग अपने विचार को हमारे अपने मंच पर जरुर दर्ज करे।     

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बचपन



पानी में खेलते इन बच्चों को देखकर यारो हमें अपना बचपना याद आ गया। यकीनन आप को भी धूमिल यादे ताज़ा हो गयी होगी। अपने छोटे पन में स्कूल से आते वक्त हमे कोई तालाब या नहर मिलता था तो हम और हमारे सखा लोग खूब मस्ती किया करते थे। इनकी अल्हडता और इस अल्हडता में नहाना और साथ में आपस में प्यार भरी उद्दण्डता को देखकर ये ऐहसास हुआ कि इस कायनात में मोहब्बत और अपनापन अभी भी है और आज इन बच्चो को देखकर ऐ और भी पक्का हो गया कि कि पानी कि चाहे कुछ बूंदे ही हो लेकिन उन बूंदो में अपनापन और शालीनता थी। तो भाई हम भी ना रुक पाएं और ना हमारा कैमरा ही रुक पाया और खींच ली कुछ तस्वीरे।

मंगलवार, 23 नवम्बर 2010

डरो नही लड़ो....




अस्सी के दशक में  एड्स के प्रसार की शुरुआत के साथ , दुनिया इस भयावह बीमारी से पीड़ित मरीजों के निराशाजनक अंत को निरीह होकर देख रही थी, जब लोगों की निगाहें   एड्स के मरीज़ की आँखों में मौत का खौफ देख कर सिहर उठती थी , तभी निराशाजनक अंत को , अंतहीन आशा मे बदलने की यानि एड्स दिवस की  शुरुआत हुई ( दिसम्बर १९८८) , यह एड्स के विरुद्ध युद्ध का आरम्भ था , इसका मक़सद केवल धन एकत्र करना नहीं था , इसका उद्देश्य था जागरूकता बढ़ाना और पूर्वाग्रहों से लड़ना , यह दिन हमे याद दिलाता है की एचआईवी अभी गया नहीं है , अभी बहुत  कुछ किया जाना बाकी है , और हम सब मिलकर साझे प्रयासों से बहुत कुछ कर सकते हैं क्योंकि जब हम जीवन मे आशा को चुनते हैं तो कुछ भी संभव होता है ।एचआईवी के विरुद्ध इस युद्ध में  निसंदेह व्यक्ति की , समाज की भागीदारी सबसे अहम् है लेकिन इसमें शक नहीं कि सरकार ने भी अपनी ज़िम्मेदारी निभाई है। इसीलिये आज मैं  एचआईवी के उन्मूलन में हमारी सरकार और विभिन्न संगठनों की भूमिका पर केन्द्रित करके यह आलेख हल्ला गुल्ला की  नई पोस्ट में लिख रहा हूँ 


सरकार की स्वास्थ परियोजनाएं, नीतियां समय समय पर विभिन्न महामारियों  और संक्रामक रोगों के विरुद्ध नागरिकों की  हर  संभव मदद करती आयी है।प्लेग, कॉलरा, टीबी, फ्लू, टाइफॉयड, चेचक, मलेरिया, स्वाइन फ्लू और डेगू बुखार, जैसे बहुत सी बीमारियां महामारी बन कर आयी उन महामारियों से लड़ने के लिए हमारी सरकार और उनकी नीतियां काफी  कारगर रही है ऐसी ही  एक बीमारी एड्स भी है जिसके मरीजों की संख्या हमारे देश   में चिंताजनक  रूप  से बढ़  रही हैलेकिन उत्साहजनक बात यह है कि एड्स के उन्मूलन के लिए , इसके प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए  सरकार की नीतियां नब्बे के शुरुआती दशक से  लगातार काम कर रही है ।इसके अंतर्गत  तरहतरह की परियोजनाएं चलायी जा रही है। जिनमे राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम मुख्य है।  इस  कार्यक्रम के संचालन में   नाको यानि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन, सबसे प्रमुख संगठन है। यह काफी महत्त्वपूर्ण है कि  राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण और निवारण नीति तथा राष्ट्रीय एड्स परिषद (एनसीए) की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं।
राष्ट्रीय एड्स नियत्रंण कार्यक्रम (एनएसीपी) अब अपने तीसरे चरण में प्रवेश कर चुका है।

राष्ट्रीय एड्स नियत्रंण कार्यक्रम (एनएसीपी) का पहला चरण 1992 से शुरु किया गया, जो 1999 तक चला। पहले चरण का मुख्य उद्देश्य भविष्य में होने वाली मृत्यु दर को कम करना  और  स्वैच्छिक रक्त दान को प्रोत्साहन देकर एचआईवी संक्रमण के फैलाव को कम करना  था।

एनएसीपी का दूसरा चरण 1999 में शुरु हुआ,जो 2006 तक चला। कार्यक्रम का लक्ष्य भारत में एड्स संक्रमण के फैलाव को रोकना था। कार्यक्रम के दूसरे दौर के अंर्तगत 2003 में 4.61% और 2006 में 1.96%  की  संक्रमण में कमी, और साथ ही दीर्घ अवधि आधार पर एचआईवी जैसी महामारी से निपटने के लिए भारत की क्षमता को मजबूत बनाना शामिल था। कार्यक्रम की सफलता को आंका जाए तो ये देखा जा सकता है कि लोगो में जागरुकता के साथ - साथ एचआईवी से पीडित लोगो के प्रति व्यवहार में परिर्वतन भी आया था इस बड़ी सफलता के पीछे एनएसीपी और गैर सरकारी संगठनों का महत्वपूर्ण योगदान था।
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (एनएसीपीके तीसरे दौर का आरम्भ 2007 में हुआ और यह  2012 तक चलेगा। इसकी रूप रेखा  एनएसीपी-I और II से प्राप्त अनुभवों के आधार पर बनाई गई है। आकड़ो के अनुसार सयुक्त परामर्श और परीक्षण केन्द्रों की संख्या 2004 में 982, 2005 में 1476 , 2006 में 4027 , 2007 में 4567 और 2008 (सितम्बर, 2008 तक) में सयुक्त परामर्श और परीक्षण केन्द्रों की संख्या 4817 थी, अभी भी  लगातार केन्द्रों की सख्या में इजाफा हो रहा है इन केन्द्रों में परीक्षण कराने वाले व्यक्तियों की संख्या 2004 में 17.5 लाख से बढ़ कर 2008-09 (अगस्त, 2008) में 37.9 लाख हो गई, मतलब साफ है की कि इन केन्द्रों से लोगो को लाभ हो रहा है। वर्ष 2007 में कुल 3.2 मिलियन गर्भवती महिलाओं ने देश भर के इंटेग्रेल काउंसलिंग एंड टेस्टिंग सेंटर (आईसीटीसी) में प्रिवेंशन ऑफ पेरेंट टू चाइल्ड ट्रांसमिशन (पीपीटीसीटी) सेवाओं का लाभ उठाया, जिनमें से 18449 गर्भवती महिलाओं को एचआईवी पोजिटिव पाया गया। इनमें से 11460 (62%) गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों को एचआईवी बच्चे में जाने से रोकने के लिए प्रोफाइलेक्टिक नेवीरेपिन दवा की एक खुराक दी गई।
  
           
एनएसीपी-III के अंर्तगत एचआईवी और एड्स से पीडित व्यक्तियों को देखभाल और समर्थन देने की आवश्यकता को पहचानना और सामुदायिक देखभाल केन्द्रों को अच्छा बनाना और कंडोम की प्रभावशीलता को एचआईवी एवं अन्य यौन संचारित संक्रमणों के फैलाव के  नियंत्रण और रोकथाम के लिए प्रभावशाली बनाना शामिल है देश की 99 प्रतिशत से अधिक आबादी संक्रमण मुक्त है। 
इस कार्यक्रम में पहली प्राथमिकता यौनकर्मी, कई  लोगो के साथ यौन संबंध रखने वाले और नशीली दवाएं  और इंजेक्शन लेने वाले हैं हस्तक्षेप कार्यक्रमों में द्वितीय प्राथमिकता लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक ड्राइवरों, कैदियों, प्रवासियों (इनमें शरणार्थी शामिल हैं) को दी गई है। सामान्य आबादी में, जिन्हें किसी सेवाओं में अधिक समय तक शामिल होना पड़ता है, उदाहरण के लिए यौन संचारित संक्रमण का इलाज करने वाले , स्वैच्छिक परामर्श और परीक्षण करने वाले प्राथमिकता में होंगे
            एनएसीपी-III में सुनिश्चित किया जाता है कि वे सभी व्यक्ति, जिन्हें उपचार की जरूरत है, उन्हें भी प्रथम श्रेणी की एआरवी दवाएं दी जाएंगी। जो बच्चे संक्रमित हैं, उन्हें बाल चिकित्सा एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी (एआटी) की पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।
            एनएसीपी-III एचआईवी से संक्रमित और प्रभावित व्यक्तियों की आवश्यकताओं विशेषकर बच्चों की आवश्यकताओं को संबोधित करने के लिए वचनबद्ध है। यह कार्य बाल संरक्षण और कल्याण में संलग्न क्षेत्रों और एजेंसियों द्वारा किया जाएगा। एचआईवी के प्रभाव को शांत करने के लिए कल्याण अभिकरणों से लिए गए समर्थन, आय उत्पादन के अवसरों और अन्य कल्याण सेवाओं का लाभ भी लिया जाएगा।
            एनएसीपी-III में मनोवैज्ञानिक सहायता और दूरदराज इलाको में सहायता पहुंचना तथा उपशामक (रोग के लक्षण कम करने वाला) देखभाल प्रदान करने के लिए सामुदायिक देखभाल केन्द्रों में निवेश करने की योजना भी है। ऐसे सामाजिक-आर्थिक निर्धारक जो व्यक्ति को संवेदनशील बनाते हैं, वे भी एचआईवी से पीडित होने का जोखिम बढ़ाते है। एनएसीपी-III में अन्य अभिकरणों के साथ मिलकर इस संवेदनशीलता में कमी लाने की दिशा में कार्य किया जाएगा, जैसे कि महिलाओं के समूह, युवा समूह, व्यापार यूनियन आदि ताकि एचआईवी निवारण को भी उनकी गतिविधियों में शामिल किया जा सके।
एनएसीपी-III के कार्यनीतिक उद्देश्य में उच्च जोखिम समूहों के साथ लक्षित हस्तक्षेप कार्यक्रम के माध्यम से  संक्रमण की रोकथाम और आम जनसंख्या में इस परियोजना को  सफल बनाना, एचआईवी/एड्स से पीडित अधिक से अधिक व्यक्तियों को बेहतर देखभाल, समर्थन और उपचार प्रदान करना सम्मिलित है जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर निवारण, देखभाल, समर्थन तथा उपचार कार्यक्रमों में संरचना, प्रणाली तथा मानव संसाधनों को सुदृढ़ बनाना और राष्ट्रव्यापी कार्यनीतिक सूचना प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ बनाना भी इसमें शामिल है इस चरण का विशिष्ट लक्ष्य उच्च दर वाले राज्यों में 60 प्रतिशत की कमी लाकर और संवेदनशील राज्यों में 40 प्रतिशत की कमी लाकर एड्स के विस्तार को पलटना और स्थिर बनाना है।
वर्तमान परिदृश्य में एचआईवी की स्थिति का आकलन और निगरानी 1992 में स्थापित सेंटीनेल निगरानी प्रक्रिया के माध्यम से नियमित रूप से किया जाता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे -III (एनएफएचएस), आईबीबीए (Integrated Biological and Behavioral assessment) और व्यवहारगत निगरानी सर्वेक्षण के अनेक आंकड़ा स्रोतों का उपयोग करते हुए बताया गया है कि वर्ष 2007 के अंत में 1.8 - 2.9 मिलियन लोग एचआईवी/एड्स से प्रभावित थे। ये पूरा आकड़ा वर्ष 2007 के दौरान विभिन्न समूहों में एचआईवी की महामारी से प्रभावित क्षेत्रों को दर्शाता  है, जिसमें इनजेक्टिबल ड्रग यूसर्स (आईडीयू) 7.2 प्रतिशत, (मानव के साथ सेक्स, men who have sex with men) एमएसएम 7.4%, एफएसडब्ल्यू  फीमेल सेक्स वर्कर  5.1 % और यौन संचारित बीमारी (एसटीडी) 3.6 %, तथा प्रसव पूर्व क्लिनिक में आने वाली महिलाओं में अल्प दर आयु समायोजित - 0.48 % शामिल है।
 
सुरक्षित रक्त दान को प्रोत्साहन देकर एचआईवी संक्रमण के फैलाव को कम करने में सफलता मिली है आकड़ो के मुताबिक लगभग 6.07% (1999), 4.61% (2003), 2.07% (2005), 1.96% (2006) से 1.87% (2007) एचआईवी दूषित रक्त से फैलता है। नाको द्वारा अनेक यौन संचारित संक्रमण क्लिनिक चलाए जाते हैं, जिनकी संख्या 2005 में 815 से बढ़ कर 2008 में 895 हो गई। वर्ष 2005 में यौन संचारित संक्रमणों का इलाज कराने वाले रोगियों की संख्या 2006 में 16.7 लाख, 2007 में 20.2 लाख थी जो 2008 25.9 लाख तक बढ़ गई है। सितम्बर 2008 में कुल 5,61,981 रोगियों को एंटी रेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) केन्द्रों में पंजीकृत किया गया है और 1,77,808 क्लिनिक की दृष्टि से सही पाएं जाने वाले रोगियों को सरकारी तथा अंतरक्षेत्रीय स्वास्थ्य केंद्र  में मुफ्त में एआरटी  करा्यी जायेगी।  कुल 31 राज्यों में यह कार्य राज्यों द्वारा 179 एआरटी केन्द्रों के माध्यम से किया गया है। पूरे देश में 159 सामुदायिक देखभाल केन्द्र स्थापित किए गए हैं और ये गैर सरकारी संगठन पीएलएचए (पीपुल लिविंग विद एचआईवी एड्स) को देखभाल और समर्थन सेवाएं प्रदान करते हैं। हस्तक्षेप परियोजना के अंर्तगत उच्च संवेदनशील आबादी के बीच एचआईवी के फैलाव को रोकने पर प्रयासरत है। इस समूहों में शामिल हैंवाणिज्यिक यौन कर्मी, इंजेक्शन के जरिए नशीली दवाएं लेने वाले लोग, पुरूषों के साथ यौन संबंध रखने वाली औरते , ट्रक ड्राइवर और प्रवासी श्रमिक। इस समय देश के विभिन्न राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में 1132 लक्षित हस्तक्षेप परियोजनाएं प्रयासरत है।
यदि लोग अपने उत्तरदायित्त्व को समझें और एड्स नियंत्रण की दिश में थोडा भी योगदान दें तो एचआईवी/एड्स से संघर्ष करना आसान है क्योंकि  इस कार्यक्रम की सफलता में लोगो की भागीदारी और जाग्रूक्यता सबसे ज्यादा अहम् है हमें एड्स के बारे में अन्य लोगों को बताने की आवश्यकता है तथा उन्हें सशक्त बनाया जाना चाहिए, ताकि वे सुरक्षित विकल्प अपना सके।
सरकार के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम का पूरे भारत में असर हो रहा है और इससे सकारात्मक परिणाम मिले हैं और यह सकारात्मक परिणाम यह प्रदर्शित करता है कि इस रोग के फैलाव को नियंत्रित करने का मार्ग आगे बढ़ता रहेगा और जल्दी ही हमारा देश एड्स मुक्त होगा।

हमें यह याद रखना चाहिए की हम सभी के भग्य एक दूसरे से जुड़े हैं , हम समाज  के लिए जो कुछ भी करते हैं अच्छा या बुरा उसका परिणाम अंततः हमको भी झेलना होता है, कुछ <