शनिवार, 15 सितंबर 2012

कभी - कभी मेरे दिल में ख्याल आता है....


 


कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है... कि काश कांग्रेस जनता के बारे में सोचती समझती तो कितना अच्छा होता...लेकिन अफसोस एक दिल के टुकड़े हजार हुए कोई एफडीआई में बिका कोई महंगाई में बिका... लेकिन जनता तो जनता है.... लेकिन सोनिया गांधी ने कहा कि उन्हें इस फैसले पर कुछ भी नहीं मालूम तो मनमोहन ने वाकई साहसिस फैसला लिया.... क्योंकि मनमोहन सिंह पुरूष है या महिला..... इस सवाल पर भी सोनिया कि मुहर लगवाते है... वो मनमोहन सिंह कैसे फैसला कर सकते है...क्या सही है क्या गलत..... लेकिन सोनिया गांधी के सहयोगियों ने बड़ी मासूमियत से कहा कि सोनिया मैडम को कुछ नहीं मालूम.... लेकिन ये सब सोनिया मैम की गणित है... क्योंकि राहुल बाबा को देश का मुखिया बनाना है... सोनिया मैडम ने सबसे ज्यादा बुद्धिमान प्रणब बाबू को रायसीना भेज दिया... ताकि राहुल बाबा को एक कांटे से झुटकारा दिला सके.... प्रणब बाबू के बाद आया देश की जनता का खून चूसने वोले सब के मन को मोहने वाले मनमोहन सिंह.... अब उनके कंधे से बंदूक से डीजल, गैस, और एफडीआई की गोली चला कर बेजारे मनमोहन को शहीदी माला पहना दिया.... और सोनियां या फिर गांधी परिवार साफ साफ बच गया... ठीक उसी तरह... जिस तरह से 2 जी मामले में राजा की बलि चढ़ाकर गांधी परिवार साफ बच गया था.. जिस तरह कोयले में मनमोहन का मुंह काला करके दाम गांधी परिवार के झोली में गया.... तो भैय्या लोगों तो अब तो मनमोहन सिंह की बलि सोनिया ने दे ही दी.... अब सिर्फ बांह चढ़ाए राहुल बाबा की ताजपोशी का इन्तजार करिये.......... जय हो सोनियां गणित की ऐसी गणित सब को आ जाए तो कोई फेल ही न हो... लेकिन ईश्वर कुछ चुनिंदा लोगो पर ही मेहरबान होता है..... इसी लिए तो मै कहता हूं कि कभी – कभी मेरे दिल में ख्याला आता है...तुझको रब ने बनाया देश को लूटने के लिए....

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

शाकाल मंहगाई से खुश हुआ



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 जब कांग्रेस ने 2004 में लोकसभा चुनाव लड़ी तो जनता के बीच ये संदेश जाने लगा था कि कांग्रेस को विजयी बनाना है.. क्योकि राजग के सरकार में सिर्फ प्याज 80 रु किलो हुआ था... तो जनता बहुत ज्यादा क्रोधित हुई थी.. देश में चारो ओर सिर्फ राजग के विरोध के नारे हर गली हर नुक्कड़ में हो रहा था.. तब लोगो को लगा की कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जो आम जनता को जानती और पहचानती है..लोगो ने 2004 के लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस को विजय तिलक लगाया और सरकार बनी... लेकिन अफसोस कि सरकार के बनते ही.. कांग्रेस ने गिरगिट की तरह रंग बदलना शुरु कर दिया... और 2004 में पेट्रोल के दाम 33.70 पैसे और डीजल के दाम 21.73 पैसे थी.. फिर 2005 में पेट्रोल के दाम 43.49 पैसे हो गए.. और डीजल 30.45 पैसे मंहगा हो गया... तब से कांग्रेस ने घोटाला और मंहगाई का ऐसा खेल खेला कि आम जनता का जीना दूभर कर दिया... 2010 में सीडब्लूजी घोटाला 2011 में 2 जी घोटाला, और 2012 में कोयला घोटाला कर के दिखा दिया कि हम वाकई वही कांग्रेस है जो कसम खा के बैठे है कि हिन्दूस्तान की जनता को गरीब ही बना के रहेगे... क्योंकि कांग्रेस चाहती है कि देश से कंगाल बना कर हम अपना पेट भरेंगें... दोस्तो अगर देश को इन घोटालेबाजो से बचाना है तो 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में हाराना होगा.... क्योकि हम सिर्फ अपने मत से ही इन घोटालोबाजो से जीत सकते है.... अगर 2014 में हमने सबक नहीं सिखाया तो हम कुछ नहीं कर सकते.... क्योकि अगर अब इनकी सरकार आयी तो हम आनाज क्या सिर्फ घास खाने पर मजबूर होना पड़ेगा.... क्योंकि डीजल, पेट्रोल और गैस मंहगा होता जा रहा है...और तो खेती हो नहीं पाएंगी जब खेती नहीं होगी तो अनाज पैदा नहीं होगा... जब अनाज पैदा नहीं होगा तो खाएंगे क्या... तो सिर्फ घास बचेगी खाने के लिए... लेकिन सवाल ये भी उठता है कि ये घोटालो की सरकार घास में भी घोटाला न कर दे....

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

दिल्ली के दंगल में आप का स्वागत है.....




 दुष्यंत ने कहा था कि....
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है

पक्ष औ' प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है

हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है

दोस्तों ! अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में संभावना है
 
बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं सोचा की कि पांच राज्यों के चुनाव के समाप्त होने पर कुछ शांति मिली ही थी कि दिल्ली नगर निगम का चुनाव की तैयारिया तेज होने लगी... तो सोचा कि कुछ लिखा जाएं.... दिल्ली के 272 सीटों के चुनाव होने है.. इसके पहले नगर निगम पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है... इस बार किसका होगा ये बताना बहुत मुश्किल है... मुश्किल इस लिए है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जो चुनावी विशेषज्ञ थे उनकी गणित थरी की थरी रह गयी... इसलिए नगर निगम किसके कब्जे में होगी बताना मुश्किल होगा.... अब बात करते है.. मुद्दो कि.... एमसीडी चुनाव का हर मुद्दा दिल्ली सरकार की गद्दी को तय करता है... इसलिए... दिल्ली का सीएम हो... या फिर विपक्ष हो...सबके सब चुनाव में लगे है... बीजेपी के एक विधायक से मेरी बात हो रही थी वो बेचारे इतना परेशान थे.. कि लगता था कि चुनाव एमसीडी का न होकर दिल्ली विधानसभा का हो.... हमने उनसे कहा कि... दो मिनट समय देगे...कुछ बात करनी है....तो उन्होंने कहा...कि भाई समय नहीं है...उन्होंने कारण भी बताया... उन्होंने कहा कि..भाई जितनी सीटे पर हम जीत दर्ज करेगें... विधानसभा चुनाव में मेरी मौजूदगी...उतनी मजबूत होगी.... तो मुझे लगा कि... कि मुद्दा तो जो है सो है...लेकिन हर पार्टी का विधायक दिल्ली विधानसभा चुनाव.....या फिर इस तरह से कह सकते है..कि.. एमसीडी चुनाव तो बहाना है.. विधानसभा चुनाव जीतना है.... आपको लगता होगा कि इतनी भूमिका गढ़ने की क्या जरुरत है... क्योकि भूमिका जितनी मजबूत होगा कहानी भी उतनी बढ़िया होगी... मुद्दो की बात करे तो लोगों ने कहा कि पार्षद बीजेपी का........ विधायक भी बीजेपी का लेकिन सरकार कांग्रेस की.. तो विकास कहा से होगा... जनता से पूछा तो कहा कि चुनाव के समय सब याद करते है.. मुद्दे भी जिन्नाद की तरह निकल आते है... लेकिन चुनाव के बाद मुद्दो का डिब्बा गोल हो जाता है.. और जो जितता है... वो फिर से पांच साल के बाद वोट मांगने आता है... लेकिन बीच में न तो किसी पार्टी का नुमांइदा दिखाई देता है... न तो कोई सुनता है... हमने जब संगम विहार का दौरा किया तो पता चला कि संगम विहार का नाम संकट विहार होना चाहिए.... वहां के लोग कैसे जीते है... उसको या तो वो महसूस कर सकते है.. या फिर भगवान क्योंकि हममे से कोई नही महसूस कर सकता है... वहां पीने के पानी के लिए लोगो को इतनी मशक्त करनी पडती है.. कि लगता है.. पानी नहीं किसी युद्ध पर विजय पाने की कोशिश कर रहे है... लेकिन सड़क पर पानी देखेगे तो आप को लगेगा कि जब सड़क पर इतना पानी है तो घर में कितना होगा... क्योंकि मै भी यही सोचता था... सड़क पर जल भराव के कारण से हर दिन कोई न कोई जरुर बीमार रहता है... लोगों का कहना कि न तो पार्षद सुनता है.. न ही विधायक लेकिन मुझे लगता है कि अगर सड़क का मुद्दा और पानी का मुद्दा समाप्त हो जाएं तो शायद राजनीति खत्म हो जाएंगी... इसीलिए कोई भी पार्टी नही चाहती कि ये मुद्दे खत्म हो.... इसी तरह कई मुद्दे है जो हर रोज हम सबको दो चार होना पड़ता है... लेकिन सरकार अगर को ये मुद्दे मंदिर में भगवान को चढ़ने वाले लड्डू लगते है.. जो चढ़ते तो भगवान को है... लेकिन उपयोग और उपभोग आम आदमी करता है... जिस तरह से एक साहूकार मिर्जा गालिब से कहता है... कि सुना है.. कि पान आपको ज़हर लगता है.. तो गालिब कहते है..कि ज़हर होता तो मै खा लेता..... पान है इसलिए नहीं खाऊंगा... हो सकता है कि आप लोगों को लगे कि मै स्टोरी से भटक गया हूं.. लेकिन मैने जो देखा वहीं लिखा...

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

छोटे राज्य की जिद


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देश में जहां-जहां पृथक राज्य बने, वहां-वहां यही नारा दिया गया था कि अलग राज्य बन जाने से उन क्षेत्रों का तेज विकास होगा। लेकिन हुआ इसका उलटा। झारखंड का उदाहरण लें, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रचुर मात्रा में खनिज संपदा से संतृप्त इस छोटे से जनजातीय राज्य में भ्रष्टाचार हिमालय की ऊंचाई को पार कर गया है। यहां के वनवासियों को आज तक विकास के नाम पर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, संचार सेवा, परिवहन सेवा तो दूर, दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं है। पीने का पानी नहीं है। जंगलों में विकास के नाम पर एक ईंट नहीं लगी है। जबकि यहां के पूर्व मुख्यमंत्री, एक के बाद एक, सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपयों के घोटालों में पकड़े गए हैं।

पृथक तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के कारण आंध्र प्रदेश की सरकार ठप पड़ी है। उद्योग व्यापार का भी खासा नुकसान हो रहा है। हैदराबादवासियों का कहना है कि तेजी से आगे बढ़ता उनका राज्य दस वर्ष पीछे चला गया है। दूसरी तरफ पृथक राज्य की मांग करने वाले इतने भावावेश में हैं कि कुछ सुनने को तैयार नहीं। हर वर्ग के लोग इस आंदोलन में शामिल होते जा रहे हैं। नित नए धरने और प्रदर्शन जारी हैं। इन लोगों को बता दिया गया है कि पृथक तेलंगाना राज्य बनने से इनका क्षेत्र तेजी से विकसित होगा, जबकि यह केवल मृगतृष्णा है।

हरियाणा जैसे एकाध उदाहरण देकर यह सिद्ध करने की कोशिश की जाती है कि छोटे राज्य में विकास संभव है। पर उसके दूसरे कारण रहे हैं। सचाई तो यह है कि अलग राज्य बनने का मतलब है आम जनता की जेब पर डाका डालना। अलग राज्य बनेगा, तो अलग विधानसभा बनेगी, अलग हाई कोर्ट बनेगा, अलग सचिवालय बनेगा, अलग मंत्रिमंडल बनेगा और तमाम आला अफसरों की अलग फौज खड़ी की जाएगी। इन सब फिजूलखर्ची का बोझ पड़ेगा आम जनता की जेब पर, जिसे झूठे आश्वासनों, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।

मुझे याद है गोरखालैंड का वह आंदोलन, जब वहां 25 वर्ष पहले पृथक राज्य बनाने की मांग चली थी। हर ओर गोरखाओं का आतंक था। आए दिन दार्र्जिलिंग में बंद हो रहे थे। बंद की अवहेलना करने वाले पर्यटकों की कारों पर पहाड़ों से पत्थर लुढ़काकर हमले किए जा रहे थे। ऐसे में आंदोलन के नेता सुभाष घीसिंग से मिलना आसान न था। बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगाकर मैं घीसिंग तक पहुंचा। मेरे चारों ओर एलएमजी का घेरा साथ चला कि कहीं मैं उनकी हत्या न कर दूं। इस आतंक के वातावरण में मैंने घीसिंग से पूछा कि उनकी इस मांग का तार्किकआधार क्या है? उत्तर मिला, ‘तुम मैदान वाला लोग हमारा शोषण करते हो। हमको अपने घरों में चौकीदार और कुक बना देते हो। हमारे राज्य की संपत्ति लूटकर ले जाते हो। हमको तुम्हारे अधीन नहीं रहना। हम अलग राज्य बनाएगा और गोरखा लोगों का डेवलपमेंट करेगा।अलग राज्य तो नहीं बना, पर गोरखा हिल डेवलपमेंट काउंसिलबन गई। बाद में उसी इलाके में काउंसिल केनेताओं के भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन चले। कुल मिलाकर गोरखा वहीं के वहीं रहे, नेताओं का खूब आर्थिक विकास हो गया।

किसी क्षेत्र का विकास न होने का कारण उस राज्य का बड़ा या छोटा होना नहीं होता। इसका कारण होता है, राजनीतिक नेतृत्व में इच्छाशक्ति का अभाव, सरकारी अफसरों का नाकारापन, जाति में बंटी जनता का वोट देते समय सही व्यक्तियों को न चुनना, मीडिया का प्रभावी तरीके से जागरूक न रहना, विपक्षी दलों का लूट में हिस्सा बांटना और सचेतक की भूमिका से जी चुराना। ऐसे ही तमाम कारण हैं, जो किसी क्षेत्र के विकास की संभावनाओं को धूमिल कर देते हैं। अगर हम सब अपनी-अपनी जगह जागरूक होकर खड़े हो जाएं, तो प्रशासन को काम करने पर मजबूर कर सकते हैं।

पर हमारी दशा भी उस राज्य की तरह है, जिसके राजा ने मुनादी करवाई कि आज रात को हर नागरिक राजधानी के मुख्य फव्वारे में एक लोटा दूध डाले, तो कल दूध का फव्वारा चलेगा। हर नागरिक ने सोचा, सभी तो दूध डालेंगे, मैं पानी ही डाल दूं तो क्या पता चलेगा? नतीजतन अगले दिन फव्वारे में पानी ही चल रहा था। जब कभी क्षेत्रीय स्तर पर पृथक राज्य की मांग को लेकर आंदोलन चलता है, जैसा आजकल तेलंगाना में हो रहा है, तो स्थानीय मीडिया आग में घी डालने का काम करता है। जबकि जरूरत इस बात की है कि उस क्षेत्र का मीडिया देश के बाकी राज्यों में जाए और वहां की जनता के अनुभव प्रसारित करे, ताकि स्थानीय जनता को पता चले कि ऐसी ही भावनाएं भड़काकर अन्य राज्यों का भी गठन हुआ था, पर उससे आम जनता को कुछ नहीं मिला।

आंदोलनकारी नेताओं को भी सोचना चाहिए कि अब समय तेजी से बदल रहा है। पहले वाला माहौल नहीं है कि एक बार सत्ता में आ गए, तो मनचाही लूट कर लो। अब तो खुफिया निगाहें हर स्तर पर सतर्क रहती हैं। किसी का भी, कभी भी, कहीं भी भांडाफोड़ हो सकता है। ऐसे में अब जनता को मूर्ख बनाकर बहुत दिनों तक लूटा नहीं जा सकता, क्योंकि जनता का आक्रोश अब उबलने लगा है। अगर पृथक राज्य की मांग करने वाले नेता वास्तव में जनता का भला चाहते हैं, तो इनको अपने मौजूदा प्रांत के विकास कार्यक्रमों और प्रशासनिक भ्रष्टाचार और निकम्मेपन के खिलाफ लड़ाई लड़नी चाहिए, जिससे इनके क्षेत्र की जनता को वास्तव में लाभ मिल सके।
लेखक....विनीत नारायण  
सौजन्य अमर उजाला